कतेक बदलल देखलहुँ समाजक हाल,
कखनो हँस्सी, कखनो सवाल ।
सपना सजल अछि सबके हृदय बीच,
तथापि बुझाइत अछि—राहि भेल नीक ?
राजनीति मे ध्वनि, विकासक गान,
जनता सुनैत छलाह झुठ्ठा बखान ।
युवाक हाथ मे बेरोजगारीक बोझ,
कखन भेटत हुनकर रोज ?
नारीक सम्मान के कखन धरि न्याय ?
की एतबे धरि रहत ? सवालक उपाय ?
पर्यावरण कनैत आ नदि–नहर सूखायल,
की हम मानव बनलहुँ अपना धरि खायल ?
समय करैत अछि प्रतिदिन नब सवाल,
उत्तर भेटय, से कठिन अछि हाल ।
जागल समाज, जौं बदलत सोच,
हर सवालकें उत्तर भेटत नीक ।
श्रवण पासमान
विदेह ना.पा–७ धनुषा
हालः जडिबुटि, काठमाण्डौं
Awesome poem, reality of our life .
Sahi bat kahli Mita badi Nik lagal kagal kahita 🙏❤️